गौरेला-पेंड्रा-मरवाही। पांचवीं अनुसूची क्षेत्र में आदिवासी जमीनों की सुरक्षा को लेकर संवैधानिक प्रावधानों के बावजूद गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले में जमीनों से जुड़े कथित फर्जीवाड़े के मामले लगातार सवाल खड़े कर रहे हैं। मृत आदिवासी महिला के नाम पर कथित तौर पर फर्जी पहचान और दस्तावेजों के जरिए रजिस्ट्री कराए जाने की शिकायत को कई महीने बीत चुके हैं, लेकिन अब तक FIR दर्ज नहीं होने और किसी राजस्व अधिकारी अथवा कर्मचारी पर कार्रवाई सामने नहीं आने से प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न लग गया है। मामला सामने आने के बाद आदिवासी समाज और शिकायतकर्ता यह सवाल उठा रहे हैं कि जब शिकायत के साथ महत्वपूर्ण दस्तावेज पुलिस के समक्ष प्रस्तुत किए गए हैं, तो फिर कार्रवाई आखिर अटकी कहां है?
मृत्यु 1996 में, रजिस्ट्री 2026 में—दस्तावेजों ने खड़े किए गंभीर सवाल
शिकायतकर्ता रामवतार गोंड के अनुसार उनकी मां नरबदिया बाई का निधन 12 जनवरी 1996 को हो चुका था। उनके निधन के बाद फौती नामांतरण के जरिए उत्तराधिकारियों के नाम राजस्व अभिलेखों में दर्ज किए जाने की बात शिकायत में कही गई है। आरोप है कि इसके बावजूद किसी अन्य महिला ने कथित रूप से नरबदिया बाई की पहचान का इस्तेमाल कर पहचान संबंधी दस्तावेज तैयार किए और 3 जून 2026 को पेंड्रारोड उप पंजीयक कार्यालय में संबंधित जमीन की रजिस्ट्री करा दी। शिकायतकर्ता का कहना है कि मृत्यु प्रमाण-पत्र सहित कथित रजिस्ट्री से संबंधित दस्तावेज पुलिस के समक्ष प्रस्तुत किए गए हैं। यदि जांच में ये आरोप सही पाए जाते हैं तो मामला बेहद गंभीर हो सकता है, क्योंकि इसमें पहचान, दस्तावेज और भूमि हस्तांतरण की पूरी प्रक्रिया की जांच आवश्यक होगी।
जिस मामले में तत्काल कार्रवाई की जरूरत थी, वहां महीनों बाद भी सन्नाटा!
अब सबसे बड़ा सवाल पुलिस और प्रशासन की कार्रवाई को लेकर है। महीनों बीत गए, लेकिन FIR तक दर्ज नहीं हुई। आखिर शिकायत पर कार्रवाई की प्रक्रिया किस स्तर पर अटकी हुई है? क्या दस्तावेजों की जांच पूरी हुई? क्या कथित रजिस्ट्री की सत्यता और उसमें इस्तेमाल दस्तावेजों का सत्यापन कराया गया? यदि जांच अभी जारी है तो उसकी स्थिति क्या है? और यदि आरोपों में दम नहीं है तो शिकायतकर्ता को स्पष्ट जानकारी क्यों नहीं दी जा रही? गंभीर आरोपों वाले किसी भी मामले में जांच का निष्पक्ष और समयबद्ध होना जरूरी है, लेकिन यहां लंबी खामोशी ने संदेह और सवालों को और हवा दे दी है।
भू-माफियाओं का कथित पैटर्न—पहले खेल, खुलासा हुआ तो ‘मैनेज’ करने की कोशिश?
सूत्रों के हवाले से यह भी चर्चा है कि जमीन के कथित खेल में सक्रिय कुछ भू-कारोबारियों का एक पैटर्न बताया जाता है—पहले कथित तौर पर जमीन से जुड़ी प्रक्रिया में गड़बड़ी करो, मामला सामने आने पर किसान और शिकायतकर्ता से लेकर संबंधित पक्षों तक को कथित तौर पर ‘मैनेज’ करने की कोशिश करो और फिर विवाद को किसी तरह शांत करा दो। हालांकि इस विशेष मामले में किसी व्यक्ति द्वारा ऐसा किए जाने की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। लेकिन सवाल यह है कि यदि किसी मामले में फर्जीवाड़े की आशंका को लेकर पुलिस शिकायत हो चुकी है, तो क्या उसके बाद कथित समझौते या दबाव की कोशिशों की भी जांच होनी चाहिए या नहीं? यही वह बिंदु है जिस पर प्रशासन और पुलिस की निष्पक्षता की परीक्षा होती है।
भूमाफिया मस्त, आदिवासी त्रस्त—राजस्व अमला आखिर बेदाग कैसे?
मामले का एक और गंभीर पहलू यह है कि आज तक किसी राजस्व अधिकारी या कर्मचारी पर कार्रवाई की जानकारी सामने नहीं आई है। जमीन के रिकॉर्ड, नामांतरण और संबंधित राजस्व प्रक्रियाओं में सरकारी तंत्र की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। ऐसे में यदि जांच में कथित फर्जीवाड़ा प्रमाणित होता है तो यह भी पता लगाया जाना जरूरी होगा कि दस्तावेजों और रिकॉर्ड का सत्यापन किस स्तर पर हुआ और कहीं किसी स्तर पर गंभीर लापरवाही तो नहीं हुई। किसी अधिकारी को जांच से पहले दोषी ठहराना उचित नहीं है, लेकिन जिम्मेदारी तय करने की जांच भी उतनी ही जरूरी है।
‘बड़े झाड़ जंगल मद’ से आदिवासी जमीन तक—क्या खुलेगा जमीनों का पूरा रिकॉर्ड?
अर्चना पोर्ते ने जिले में आदिवासी भूमि, ‘बड़े झाड़ जंगल मद’, संदिग्ध नामांतरण, कथित मद परिवर्तन और जमीन हस्तांतरण से जुड़े मामलों की व्यापक जांच की मांग की है। उनका आरोप है कि मामला केवल एक जमीन तक सीमित नहीं है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या जिला प्रशासन जिले की संवेदनशील जमीनों का व्यापक रिकॉर्ड परीक्षण कराएगा? किन जमीनों का मद बदला गया, किन जमीनों में नामांतरण हुआ और किन जमीनों के हस्तांतरण को लेकर शिकायतें सामने आईं—यदि इन सभी बिंदुओं पर जांच हो तो जमीन कारोबार की वास्तविक तस्वीर सामने आ सकती है।
अब प्रशासन से सवाल—फाइलों में दबा रहेगा मामला या निकलेगा सच?
गौरेला-पेंड्रा-मरवाही में यह मामला अब सिर्फ एक कथित रजिस्ट्री का विवाद नहीं रह गया है। यह सवाल प्रशासनिक जवाबदेही, राजस्व रिकॉर्ड की विश्वसनीयता और आदिवासी भूमि की सुरक्षा से जुड़ गया है। यदि शिकायत गलत है तो जांच कर तत्काल सच सामने लाया जाए। यदि शिकायत में लगाए गए आरोप सही पाए जाते हैं तो FIR सहित कानून के अनुसार कार्रवाई हो और जिस स्तर पर लापरवाही हुई है, वहां जिम्मेदारी तय की जाए।
सबसे बड़ा सवाल यही है—जिस मामले में शिकायतकर्ता के अनुसार मृत व्यक्ति के नाम पर कथित रजिस्ट्री जैसे गंभीर आरोप हैं, उसमें महीनों बाद भी FIR क्यों नहीं? राजस्व अमले की भूमिका की जांच क्यों नहीं? और यदि सब कुछ नियमों के मुताबिक है तो प्रशासन खुलकर स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं करता?
भूमाफिया मस्त हैं या नहीं, यह जांच का विषय है; लेकिन आदिवासी त्रस्त होने की शिकायतों के बीच प्रशासन की यह लंबी खामोशी अब खुद एक बड़ा सवाल बन चुकी है। पांचवीं अनुसूची क्षेत्र में जमीन का सवाल सिर्फ कागज का सवाल नहीं—यह अधिकार और जवाबदेही का सवाल है। अब देखना होगा कि प्रशासन इस मामले में चुप्पी तोड़ता है या यह शिकायत भी कार्रवाई की प्रतीक्षा में फाइलों के ढेर में दबकर रह जाती है।








