Marwahi -मृत आदिवासी महिला को जिंदा बताकर रजिस्ट्री सही ठहराने का दावा, अब सवाल—जोहरी बाई आखिर बेलपतिया बाई उर्फ जोहरी बाई केवट कैसे बन गईं?

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गौरेला-पेंड्रा-मरवाही। जिले की मरवाही तहसील के ग्राम करहनी स्थित खसरा नंबर 12/20 की भूमि को लेकर विवाद अब रजिस्ट्री की वैधता से आगे बढ़कर राजस्व अभिलेखों में दर्ज खातेदार की पहचान पर केंद्रित हो गया है। आरोप है कि उक्त भूमि मूल रूप से जोहरी बाई के नाम दर्ज थी, जिनका निधन वर्ष 2010 में हो चुका था। इसके बावजूद दिनांक 16 अप्रैल 2026 को इसी भूमि की रजिस्ट्री AVINASH ENERGY PRIVATE LIMITED, रायपुर के पक्ष में किए जाने और बाद में प्रशासनिक स्तर पर इसे सही बताए जाने को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

जनसंपर्क विभाग के खंडन के बाद भी सबसे बड़ा सवाल बरकरार

मामले को लेकर जनसंपर्क विभाग की ओर से संबंधित खबर का खंडन करते हुए रजिस्ट्री को सही बताया गया। लेकिन खंडन के बाद भी मूल सवाल अपनी जगह कायम है—पूर्व के राजस्व एवं अन्य दस्तावेजों में जिस महिला का नाम जोहरी बाई दर्ज था, वही बाद की प्रक्रिया में ‘बेलपतिया बाई उर्फ जोहरी बाई केवट’ कैसे बन गईं? यदि प्रशासन का दावा है कि बेलपतिया बाई ही मूल खातेदार जोहरी बाई थीं, तो दोनों नामों की पहचान एक होने का प्रमाण क्या है?

आदिवासी खातेदार से ‘बेलपतिया बाई केवट’ तक कैसे पहुंचा रिकॉर्ड?

करहनी के खसरा नंबर 12/20 के मामले में यही सबसे बड़ा जांच योग्य बिंदु है। उपलब्ध पुराने दस्तावेजों में भूमि की खातेदार जोहरी बाई की पहचान आदिवासी महिला के रूप में सामने आती है, जबकि बाद की प्रक्रिया में बेलपतिया बाई उर्फ जोहरी बाई केवट का नाम सामने आता है। ऐसे में राजस्व विभाग को बताना होगा कि यह पहचान किस दस्तावेज, आदेश या सत्यापन प्रक्रिया के आधार पर स्थापित की गई। क्या परिवार और वंशावली का सत्यापन हुआ? क्या पुराने राजस्व अभिलेखों से मिलान किया गया? क्या मृत्यु प्रमाण पत्र की जांच की गई? और क्या संबंधित महिला की वास्तविक पहचान का स्वतंत्र सत्यापन किया गया?

मृत्यु वर्ष 2010, फिर 2026 में रजिस्ट्री कैसे?

सबसे गंभीर सवाल यह भी है कि यदि जोहरी बाई का निधन वर्ष 2010 में हो चुका था, तो 16 अप्रैल 2026 की रजिस्ट्री में उनकी पहचान और जीवित होने संबंधी स्थिति किस आधार पर स्वीकार की गई? प्रशासन द्वारा रजिस्ट्री को सही बताए जाने के बावजूद यह स्पष्ट किया जाना जरूरी है कि रजिस्ट्री से पहले खातेदार की पहचान की जांच किस स्तर पर हुई और संबंधित दस्तावेजों का सत्यापन किस अधिकारी ने किया।

भू-माफियाओं का कथित पैटर्न—शिकायत के बाद समझौते का खेल?

मामले में यह आरोप भी लगाया जा रहा है कि जमीन से जुड़े विवादों में कथित भू-माफिया एक विशेष पैटर्न अपनाते हैं—पहले विवादित तरीके से जमीन का सौदा या हस्तांतरण, फिर मामला सामने आने पर शिकायतकर्ता अथवा संबंधित पक्ष को लाखों रुपये देकर समझौता कराने और शिकायत को रफा-दफा कराने का प्रयास। इन आरोपों की स्वतंत्र जांच आवश्यक है। लेकिन यदि किसी शिकायत को आर्थिक लेन-देन के माध्यम से समाप्त कराने का प्रयास हुआ है, तो इसकी भी जांच होनी चाहिए।

पैसे के समझौते से क्या मृत महिला की पहचान बदल जाती है?

यहां सबसे अहम बात यह है कि मान लिया जाए कि किसी स्तर पर शिकायतकर्ता और दूसरे पक्ष के बीच समझौता हुआ हो, तब भी खसरा नंबर 12/20 की मूल खातेदार जोहरी बाई की पहचान से जुड़े दस्तावेजी सवाल समाप्त नहीं हो जाते। किसी भी कथित समझौते से यह सवाल खत्म नहीं होता कि जोहरी बाई और बेलपतिया बाई उर्फ जोहरी बाई केवट एक ही व्यक्ति थीं या नहीं और यदि थीं तो इसका प्रमाण क्या है।

राजस्व विभाग अब दस्तावेजों के साथ जवाब दे

अब सवाल सीधे मरवाही तहसील के राजस्व विभाग से है—जोहरी बाई की पहचान को बेलपतिया बाई से जोड़ने वाला आदेश कहां है? दोनों नामों को एक मानने का आधार क्या है? कथित शपथपत्र की जांच किस अधिकारी ने की? मृत्यु प्रमाण पत्र का परीक्षण हुआ या नहीं? संबंधित पटवारी ने क्या रिपोर्ट दी? और ग्राम करहनी, खसरा नंबर 12/20 की 16 अप्रैल 2026 की रजिस्ट्री से पहले वास्तविक खातेदार एवं वारिसों की पहचान का सत्यापन किस स्तर पर किया गया?

खंडन से ज्यादा जरूरी है पहचान की पूरी कड़ी सामने रखना

जनसंपर्क विभाग का खंडन प्रशासन का पक्ष हो सकता है, लेकिन इससे दस्तावेजों के बीच दिखाई दे रहे विरोधाभास अपने आप समाप्त नहीं हो जाते। यदि रजिस्ट्री पूरी तरह सही है, तो प्रशासन को वह पूरी दस्तावेजी कड़ी सार्वजनिक करनी चाहिए, जिससे साबित हो कि जोहरी बाई ही बेलपतिया बाई उर्फ जोहरी बाई केवट थीं।

क्योंकि सवाल सिर्फ 16 अप्रैल 2026 की रजिस्ट्री का नहीं है। सवाल मरवाही तहसील के ग्राम करहनी के खसरा नंबर 12/20 की उस पहचान का है, जिसमें एक ओर मृत आदिवासी खातेदार जोहरी बाई का रिकॉर्ड सामने आता है और दूसरी ओर बाद की प्रक्रिया में बेलपतिया बाई केवट का नाम सामने आता है। आखिर यह पहचान बदली कैसे और किसके दस्तावेजी आधार पर? यही वह सवाल है जिसका जवाब खंडन से नहीं, बल्कि मूल राजस्व रिकॉर्ड और विधिवत जांच से मिलना चाहिए।

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