“15 जुलाई का आदेश, 28-29 जुलाई की संलग्नता!”
पोड़ी उपरोड़ा BEO कार्यालय में नियमों पर ‘मौखिक आदेश’ भारी? संचालनालय के निर्देश के 13 दिन बाद जारी हुए तीन संलग्नीकरण आदेश
कोरबा/पोड़ी उपरोड़ा। शिक्षा विभाग में नियमों के पालन को लेकर एक गंभीर मामला सामने आया है। आरोप है कि लोक शिक्षण संचालनालय, छत्तीसगढ़ के स्पष्ट लिखित निर्देशों के बावजूद विकासखंड शिक्षा अधिकारी (BEO) कार्यालय, पोड़ी उपरोड़ा ने नए संलग्नीकरण (अटैचमेंट) आदेश जारी कर दिए। इससे शासन के आदेशों के अनुपालन और विभागीय जवाबदेही पर सवाल खड़े हो गए हैं।
15 जुलाई 2026 को लोक शिक्षण संचालनालय ने पत्र क्रमांक-812 जारी कर सभी संलग्न गैर-शैक्षणिक कर्मचारियों को एक सप्ताह के भीतर मूल पदस्थापना स्थल पर लौटने के निर्देश दिए थे। आदेश में यह भी उल्लेख था कि निर्धारित समय-सीमा के बाद कार्यभार ग्रहण नहीं करने की स्थिति में ‘ब्रेक इन सर्विस’ जैसी कार्रवाई की जा सकती है। इस आदेश का उद्देश्य वर्षों से विभिन्न कार्यालयों में संलग्न कर्मचारियों को पुनः विद्यालयों में भेजकर शैक्षणिक व्यवस्था को मजबूत करना था।
लेकिन इसी आदेश के 13 दिन बाद, 28 और 29 जुलाई को पोड़ी उपरोड़ा BEO कार्यालय से तीन अलग-अलग संलग्नीकरण आदेश जारी किए गए।
13 दिन बाद जारी हुए तीन आदेश
28 जुलाई को जारी आदेश क्रमांक-814 के तहत श्री पवन कुमार श्रीवास्तव, सहायक ग्रेड-02, शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय लमना को BEO कार्यालय में संलग्न किया गया। आदेश में कारण बताया गया कि लिपिक श्री प्रदीप कुमार मिश्रा के निलंबन तथा श्री अभिषेक राव आहेर के तहसील कार्यालय में संलग्न होने के कारण कार्यालयीन कार्य प्रभावित हो रहे हैं।
इसी दिन आदेश क्रमांक-816 के माध्यम से श्री छवि कुमार अहिरवार, सहायक ग्रेड-02, शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय मोरगा को बीआरसी कार्यालय में लेखापाल का कार्य सौंपा गया। इसका आधार लेखापाल श्रीमती पूजा द्विवेदी के मातृत्व अवकाश पर होने को बताया गया।
इसके बाद 29 जुलाई को जारी आदेश क्रमांक-821 में श्री गुरुशरण प्रताप सिंह, सहायक ग्रेड-02, शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय माचाडोली को पुनः BEO कार्यालय में अन्य आदेश पर्यंत कार्य करने के निर्देश दिए गए।
हर आदेश में ‘मौखिक निर्देश’ का हवाला
इन तीनों आदेशों में जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) के मौखिक निर्देश का उल्लेख किया गया है। यहीं से विवाद खड़ा होता है। जब संचालनालय का लिखित आदेश संलग्नता समाप्त करने का था, तब क्या केवल मौखिक निर्देश के आधार पर नए संलग्नीकरण किए जा सकते हैं? यदि हां, तो शासन के लिखित आदेशों की बाध्यता का क्या महत्व रह जाता है?
कार्यालय की मजबूरी या नियमों की अनदेखी?
विभागीय सूत्रों के अनुसार BEO कार्यालय में कर्मचारियों की कमी है। एक लिपिक निलंबित है, दूसरा तहसील कार्यालय में संलग्न है और महिला लेखापाल मातृत्व अवकाश पर हैं। ऐसे में कार्यालय संचालन के लिए वैकल्पिक व्यवस्था आवश्यक थी।
हालांकि प्रशासनिक विशेषज्ञों का मानना है कि व्यावहारिक आवश्यकता और नियमों का पालन—दोनों के बीच संतुलन बनाना प्रशासन की जिम्मेदारी है। यदि संचालनालय का आदेश लागू था, तो क्या उससे अलग व्यवस्था करने के लिए सक्षम स्तर से लिखित अनुमति ली गई थी? यही सबसे बड़ा प्रश्न है।
सवाल जो जवाब मांगते हैं
- जब 15 जुलाई को संलग्नता समाप्त करने का आदेश जारी हो चुका था, तो 28 और 29 जुलाई को नए संलग्नीकरण किस आधार पर किए गए?
- क्या मौखिक निर्देश शासन के लिखित आदेश से ऊपर हो सकते हैं?
- “अन्य आदेश पर्यंत” संलग्नता क्या संचालनालय के समयबद्ध निर्देशों के अनुरूप है?
- यदि भविष्य में ‘ब्रेक इन सर्विस’ जैसी कार्रवाई होती है, तो इसकी जिम्मेदारी कर्मचारी की होगी या आदेश जारी करने वाले अधिकारियों की?
बीईओ का पक्ष नहीं मिल सका
इस पूरे मामले में पक्ष जानने के लिए विकासखंड शिक्षा अधिकारी के. राजेश्वर दयाल से संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन उनसे संपर्क नहीं हो सका। इसलिए उनका पक्ष समाचार में शामिल नहीं किया जा सका। यदि उनका स्पष्टीकरण प्राप्त होता है, तो उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।
फिलहाल यह मामला शिक्षा विभाग में लिखित आदेश बनाम मौखिक निर्देश की बहस को फिर से सामने ले आया है। यदि तथ्यों के अनुरूप आदेशों में विरोधाभास है, तो संबंधित सक्षम प्राधिकारी द्वारा इसकी जांच और स्थिति स्पष्ट किया जाना आवश्यक होगा।








