गौरवपथ की नाप में दुकानें, फिर भी 30 साल की लीज! जनपद ने निकाली नीलामी, बिना सीढ़ी की दुकानों पर भी सवाल
जनप्रतिनिधियों और पत्रकारों की मौखिक शिकायत के बाद CEO का बयान—SDM पेंड्रारोड के आदेश के बाद आगामी समय में निरस्त की जाएगी निविदा
गौरेला। नगर में प्रस्तावित गौरवपथ निर्माण को लेकर जनपद पंचायत गौरेला के शॉपिंग कॉम्पलेक्स की ऊपरी दुकानों की नीलामी प्रक्रिया अब सवालों के घेरे में आ गई है। गौरवपथ निर्माण के लिए किए गए सड़क के नाप-जोख और सीमांकन में सार्वजनिक दुकानों के शटर के अंदर तक का हिस्सा सड़क क्षेत्र में चिह्नित किए जाने की बात सामने आने के बाद भी इन्हीं कॉम्पलेक्स की ऊपरी दुकानों को 30 वर्ष की लीज पर देने के लिए निविदा जारी किए जाने पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
मामले को लेकर जनप्रतिनिधियों और पत्रकारों द्वारा जनपद पंचायत के जिम्मेदार अधिकारियों के समक्ष मौखिक शिकायत की गई। इसके बाद जनपद पंचायत गौरेला के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (CEO) ने मौखिक रूप से बताया कि उक्त शिकायतों को संज्ञान में लिया गया है और SDM पेंड्रारोड के आदेश के बाद आगामी समय में उक्त निविदा को निरस्त किया जाएगा।
सड़क की सीमा में दुकानें, फिर नीलामी किस आधार पर?
मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब गौरवपथ निर्माण के लिए सड़क की सीमा निर्धारित करने के दौरान शॉपिंग कॉम्पलेक्स और सार्वजनिक दुकानों के हिस्से तक नाप-जोख की गई है, तो उसी परिसर की ऊपरी दुकानों को लंबी अवधि की लीज पर देने के लिए नीलामी प्रक्रिया क्यों शुरू की गई?
यदि भविष्य में गौरवपथ निर्माण के दौरान संबंधित परिसर या उसका कोई हिस्सा प्रभावित होता है, तो नीलामी के माध्यम से दुकान लेने वाले लोगों के अधिकार और उनके संभावित नुकसान की जिम्मेदारी किसकी होगी—यह सवाल भी महत्वपूर्ण हो जाता है।
30 साल की लीज और तीन लाख की न्यूनतम बोली
नीलामी दस्तावेज के अनुसार संबंधित दुकानों के लिए न्यूनतम बोली राशि 3 लाख रुपये तथा मासिक किराया 2 हजार रुपये निर्धारित किए जाने की जानकारी सामने आई है। वहीं लीज अवधि 30 वर्ष रखे जाने का प्रावधान बताया जा रहा है।
ऐसे में यदि गौरवपथ निर्माण के कारण भविष्य में दुकानों पर कोई प्रभाव पड़ता है, तो इतने लंबे समय की लीज देने से पहले तकनीकी और प्रशासनिक स्तर पर क्या-क्या परीक्षण किए गए, यह भी जांच का विषय बन गया है।
बिना सीढ़ी के दुकानों की नीलामी पर भी सवाल
नीलामी प्रक्रिया को लेकर दूसरा बड़ा सवाल दुकानों की मूलभूत सुविधाओं से जुड़ा है। बताया जा रहा है कि शॉपिंग कॉम्पलेक्स की ऊपरी दुकानों तक पहुंचने के लिए सीढ़ी का निर्माण तक पूरा नहीं हुआ है।
ऐसे में सवाल उठता है कि जब दुकान तक पहुंचने की मूलभूत व्यवस्था ही पूरी नहीं हुई थी, तो इन दुकानों को नीलामी के लिए प्रस्तुत करने का निर्णय किस आधार पर लिया गया?
शिकायत के बाद अब निरस्तीकरण की बात
मामले में जनप्रतिनिधियों और पत्रकारों की मौखिक शिकायत के बाद जनपद पंचायत CEO द्वारा निविदा को निरस्त किए जाने की बात कही गई है। हालांकि, फिलहाल यह मामला मौखिक जानकारी और प्रस्तावित कार्रवाई के स्तर पर है। निविदा के औपचारिक निरस्तीकरण का लिखित आदेश सामने आने के बाद ही स्थिति पूरी तरह स्पष्ट होगी।
अब लिखित आदेश का इंतजार
पूरे मामले में अब निगाहें SDM पेंड्रारोड के आदेश और उसके आधार पर जनपद पंचायत द्वारा जारी किए जाने वाले लिखित निरस्तीकरण आदेश पर टिकी हैं।
सवाल साफ है—जब गौरवपथ की नाप में दुकानें प्रभावित होने की आशंका पहले से सामने आ रही थी, तो 30 साल की लीज वाली नीलामी प्रक्रिया शुरू ही क्यों की गई?
अब देखना होगा कि प्रशासन इस मामले में केवल निविदा निरस्त करता है या गौरवपथ की प्रस्तावित सीमा, शॉपिंग कॉम्पलेक्स और नीलामी प्रक्रिया के बीच समन्वय को लेकर पूरी तकनीकी जांच भी कराता है।








