गौरेला-पेंड्रा-मरवाही। सोशल मीडिया पर रॉयल्टी भुगतान प्रमाण-पत्र (रॉयल्टी क्लीयरेंस) के नाम पर प्रसारित कथित भ्रामक एवं तथ्यहीन जानकारी का खनिज विभाग ने आधिकारिक रूप से खंडन करते हुए पूरी प्रक्रिया को नियमबद्ध, पारदर्शी और दस्तावेजों के सत्यापन पर आधारित बताया है। विभाग ने यह भी स्पष्ट किया है कि रॉयल्टी भुगतान प्रमाण-पत्र जारी करने के लिए किसी भी व्यक्ति, दलाल या मध्यस्थ को अधिकृत नहीं किया गया है।
विभाग के इस आधिकारिक खंडन के बाद अब कई गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। यदि विभाग के अनुसार सोशल मीडिया पर प्रसारित जानकारी पूरी तरह भ्रामक और तथ्यहीन थी, तो आखिर उसे प्रसारित किसने किया? क्या विभाग उस व्यक्ति, संस्था, पेज या सोशल मीडिया अकाउंट की पहचान कर चुका है? यदि हां, तो उसका नाम सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया? और यदि पहचान नहीं हुई है, तो फिर सूचना को भ्रामक घोषित करने का आधार क्या है?
सबसे अहम सवाल यह है कि क्या मामला केवल प्रेस विज्ञप्ति जारी कर खंडन करने तक ही सीमित रहेगा, या फिर सरकारी विभाग के नाम पर कथित रूप से भ्रामक सूचना फैलाने वालों के विरुद्ध कोई ठोस कानूनी कार्रवाई भी होगी। यदि किसी ने विभाग की कार्यप्रणाली पर गलत जानकारी फैलाकर जनता को भ्रमित करने का प्रयास किया है, तो उसके विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई होना भी उतना ही जरूरी माना जाता है, जितना कि उस सूचना का खंडन करना।
विभाग की प्रेस विज्ञप्ति में आमजन से अपुष्ट सूचनाओं पर विश्वास नहीं करने की अपील की गई है, लेकिन कथित भ्रामक सूचना फैलाने वाले का नाम, उसके विरुद्ध दर्ज शिकायत, प्रस्तावित कानूनी कार्रवाई या जांच की स्थिति का कोई उल्लेख नहीं किया गया है। इससे पूरे मामले में पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर चर्चा तेज हो गई है।
प्रशासनिक मामलों के जानकारों का मानना है कि जब कोई सरकारी विभाग किसी सूचना को आधिकारिक रूप से “भ्रामक” और “तथ्यहीन” घोषित करता है, तब सामान्यतः उसके स्रोत की पहचान और यदि आवश्यक हो तो उसके विरुद्ध की गई कार्रवाई की जानकारी भी सार्वजनिक की जाती है। इससे न केवल विभाग की विश्वसनीयता बढ़ती है, बल्कि भविष्य में इस प्रकार की घटनाओं पर भी प्रभावी रोक लगती है।
अब लोगों की नजर खनिज विभाग की अगली कार्रवाई पर टिकी है। क्या विभाग केवल खंडन जारी कर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान लेगा, या फिर कथित भ्रामक सूचना के स्रोत तक पहुंचकर उसके विरुद्ध वैधानिक कार्रवाई भी करेगा? इस पूरे मामले में विभाग की अगली कार्रवाई ही तय करेगी कि यह विवाद केवल एक प्रेस विज्ञप्ति तक सीमित रहता है या जवाबदेही और पारदर्शिता की दिशा में कोई ठोस कदम भी उठाया जाता है।








